हनुमान चालीसा (36श्लोक)

 हनुमान चालीसा के 36 वें श्लोक का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:-

श्लोक:

"अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि भक्त कहाई।।"

भावार्थ:

जो व्यक्ति हनुमानजी की भक्ति करता है, वह अपने जीवन के अंत में श्रीराम के परम धाम (अयोध्या या वैकुंठ) को प्राप्त करता है। ऐसे भक्त को हर जन्म में भगवान की भक्ति का अवसर मिलता है और वह हरि-भक्त के रूप में जन्म लेता है।

विस्तृत विवेचन:

1. "अंतकाल रघुबर पुर जाई" का अर्थ:

"अंतकाल" का अर्थ है मृत्यु का समय। जो भी व्यक्ति हनुमानजी की भक्ति करता है, वह अपने अंतिम समय में श्रीराम के धाम को प्राप्त करता है।

"रघुबर पुर" से तात्पर्य श्रीराम के लोक से है, जिसे वैकुंठ भी कहा जा सकता है।

गीता में श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि जो अंतिम समय में भगवान का स्मरण करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार, हनुमानजी की भक्ति भी मृत्यु के बाद श्रीराम के चरणों तक पहुँचा सकती है।

2. "जहां जन्म हरि भक्त कहाई" का तात्पर्य:

यदि कोई व्यक्ति हनुमानजी की भक्ति करते हुए मोक्ष न भी प्राप्त कर सके, तो उसका अगला जन्म भी एक भक्त के रूप में होगा।

ऐसे व्यक्ति को हर जन्म में भगवान की भक्ति का अवसर मिलेगा और वह ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर अग्रसर रहेगा।

इसका अर्थ यह भी है कि हनुमानजी की भक्ति करने वालों को अधार्मिक या दुखदायी जन्म नहीं मिलता, बल्कि वे पुण्यात्मा बनकर जन्म लेते हैं।

प्रासंगिकता:

यह श्लोक हमें प्रेरित करता है कि हम हनुमानजी की भक्ति करें, ताकि हमारा जीवन और मृत्यु दोनों ही शुभ हों।

मृत्यु के समय भगवान का स्मरण अत्यंत कठिन होता है, लेकिन यदि जीवनभर हनुमानजी की सेवा और स्मरण किया जाए, तो यह संभव हो सकता है।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हनुमानजी की कृपा से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर सुधर सकते हैं और वह सच्चे भक्त के रूप में जन्म ले सकता है।

निष्कर्ष:

हनुमानजी की भक्ति करने से भक्त को अंत में श्रीराम के धाम की प्राप्ति होती है। यदि मोक्ष न भी मिले, तो हर जन्म में वह एक भक्त के रूप में जन्म लेकर भगवान की भक्ति करता रहता है। इसलिए, हनुमानजी की आराधना जीवन और मृत्यु, दोनों को मंगलमय बना देती है।

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