बजरंग बाण (श्लोक 10)
बजरंग बाण श्लोक 10 भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"अब विलंब केही कारण स्वामी।
कृपा करहुं उर अंतर्यामी।।"
शब्दार्थ:
अब = अब (वर्तमान समय)
विलंब = देरी
केही कारण = किस कारण से
स्वामी = प्रभु (हनुमान जी)
कृपा करहुं = कृपा कीजिए
उर = हृदय
अंतर्यामी = जो हृदय की बात जानने वाले हैं
भावार्थ:
हे प्रभु हनुमान! अब किस कारण से देरी हो रही है? आप तो अंतर्यामी हैं, हृदय की बात जानते हैं — कृपया अब कृपा करें।
विस्तृत विवेचन:
1. भक्त की पुकार और व्याकुलता:
यह श्लोक उस भाव का प्रतीक है जब भक्त अपने दुखों और कष्टों से थककर प्रभु से सीधा संवाद करता है।
वह कहता है — "अब और कितनी देर, हे स्वामी?"
आपने सब कुछ देखा, सुना, समझा... फिर भी अभी तक कृपा क्यों नहीं की?
2. हनुमान जी की अंतर्यामी शक्ति:
भक्त जानता है कि हनुमान जी केवल बाह्य नहीं, हृदय की गहराइयों को पढ़ने वाले अंतर्यामी हैं।
इसलिए वह उन्हें यह याद दिला रहा है कि — "आपको मेरी पुकार कहने की ज़रूरत नहीं, आप तो बिना कहे ही सब जान सकते हैं।"
3. पूर्ण समर्पण की स्थिति:
यह श्लोक उस चरम भक्ति का स्वरूप है जहाँ भक्त अपने सारे अधिकार प्रभु को सौंप देता है, और अब बस एक ही इच्छा शेष है —
"अब देरी न करें, मुझे अपना बना लें, मुझे कष्टों से उबार लें।"
4. प्रार्थना की शक्ति:
यह श्लोक हमें सिखाता है कि कभी-कभी ईश्वर को भाव-विभोर होकर पुकारना भी एक माध्यम है कृपा प्राप्त करने का।
जब शब्दों से नहीं, तो मन के कंपन से भी प्रभु सुन लेते हैं।
निष्कर्ष:
"अब विलंब केही कारण स्वामी..."
यह श्लोक भक्त की उस अंतिम और गहनतम पुकार का प्रतीक है जो वह अपने अंतर्यामी प्रभु हनुमान से करता है।
जब सारे प्रयास थम जाएँ, जब आस टूटने लगे, तब यही पुकार दिल से निकलती है —
"हे स्वामी, अब और देरी क्यों? कृपा कीजिए..."
सच्चे हृदय से किया गया यह विनय ही अंततः कृपा को आकर्षित करता है।
जय श्री हनुमान!
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