बजरंग बाण (श्लोक 11)
बजरंग बाण श्लोक 11 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"जय जय लखन प्राण के दाता।
आतुर होई दुःख करहुं निपाता।।"
शब्दार्थ:
जय जय = बारंबार विजय हो
लखन प्राण के दाता = लक्ष्मण के प्राणों के रक्षक (प्राणदाता)
आतुर होई = व्याकुल होकर
दुःख करहुं निपाता = दुखों का नाश कर दीजिए
भावार्थ:
हे हनुमान जी! आप तो लक्ष्मण जी के प्राणों के रक्षक हैं। जैसे आप तब उनके लिए व्याकुल होकर संजीवनी लाए थे, वैसे ही अब कृपा करके मेरे दुखों का भी नाश करें। आपकी बारंबार जय हो!
विस्तृत विवेचन:
1. लक्ष्मण के लिए हनुमान जी की भक्ति:
यह श्लोक रामकथा के उस प्रसंग की याद दिलाता है जब लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए थे और हनुमान जी ने पूरा पहाड़ उठा लाकर संजीवनी बूटी से उन्हें जीवनदान दिया था।
इसलिए उन्हें कहा गया — "लखन प्राण के दाता।"
वे केवल बलवान नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति में भी अद्वितीय हैं।
2. भक्त की याचना:
अब भक्त कहता है —
"जैसे आप लक्ष्मण जी के लिए व्याकुल हो गए थे, वैसे ही मेरे कष्टों को देखकर कृपा करें और दुखों का अंत करें।"
यानी, यह श्लोक प्रार्थना और स्मरण का सुंदर उदाहरण है।
3. प्रभु का सहज स्वभाव:
"आतुर होई" — हनुमान जी का यह सहज स्वभाव है कि वे भक्तों की पीड़ा देखकर तुरंत द्रवित हो जाते हैं।
भक्त को केवल सच्चे भाव से पुकारना होता है।
4. संदेश:
यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब कोई पीड़ा से घिर जाए, तो उसे प्रभु से उसी तरह प्रार्थना करनी चाहिए जैसे
लक्ष्मण के लिए हनुमान जी ने हर सीमा तोड़ दी थी।
निष्कर्ष:
"जय जय लखन प्राण के दाता..."
यह श्लोक हनुमान जी की करुणा, भक्ति और संकटमोचक रूप का उज्ज्वल प्रतीक है।
जिन्होंने लक्ष्मण के लिए पहाड़ उठा लिया, वे भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हैं —
बस भक्ति सच्ची हो, पुकार दिल से हो।
जय श्री हनुमान — संकट हरने वाले, प्राण रक्षक!
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