बजरंग बाण (श्लोक16)

 बजरंग बाण श्लोक 16 भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक:

"ऊं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा।

ऊं हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा।।"

शब्दार्थ:

ऊं = ब्रह्म का मूल मंत्र, दिव्यता की ध्वनि

ह्रीं = शक्ति और भक्ति का बीज मंत्र

हनुमंत कपीसा = वानरों के राजा हनुमान जी

हुं = हुंकार या नाशकारी शक्ति का मंत्र

हनु = प्रहार करो

अरि = शत्रु

उर = हृदय

शीशा = मस्तक

भावार्थ:

हे हनुमान जी!

आप "ऊं ह्रीं" की शक्ति से पूजित, कपीश (वानरराज) हैं।

कृपया "हुं हुं" जैसे प्रचंड हुंकार के साथ मेरे शत्रुओं के हृदय और मस्तक पर प्रहार कीजिए।

विस्तृत विवेचन:

1. बीज मंत्रों की महिमा:

"ऊं" — सृष्टि का आधार, ब्रह्म रूप।

"ह्रीं" — देवी शक्ति का बीज मंत्र, भक्ति, शुद्धि और रक्षण का प्रतीक।

"हुं" — अग्नि स्वरूप शक्ति जो सभी नकारात्मकताओं को भस्म कर देती है।

इन मंत्रों के माध्यम से भक्त आध्यात्मिक शक्ति को जाग्रत करता है।

2. हनुमान जी का रौद्र रूप:

इस श्लोक में भक्त हनुमान जी को रौद्र रूप में बुला रहा है —

वह उनसे कहता है कि अब शांत नहीं,

बल्कि शत्रु के उर (हृदय) और शीश (सिर) को नष्ट करने हेतु आप प्रकट हों।

3. आशय:

यह श्लोक केवल बाहरी शत्रुओं के लिए नहीं है,

बल्कि भीतर के राक्षसों — जैसे मोह, लोभ, भय, भ्रम — को भी समाप्त करने का आह्वान करता है।

4. भक्ति और युद्ध का संगम:

श्लोक में मंत्र (भक्ति) और प्रहार (पराक्रम) — दोनों हैं।

यही हनुमान जी की विशेषता है — वे संतों में विनम्र और शत्रुओं में भयंकर हैं।

निष्कर्ष:

"ऊं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा..."

यह श्लोक हनुमान जी की दिव्यता और रौद्रता दोनों का अद्भुत संगम है।

भक्त जब यह मंत्र उच्चारित करता है, तो वह दुर्भावनाओं और शत्रु-भावनाओं के विनाश हेतु

हनुमान जी को साक्षात बुलाता है।

यह केवल रक्षा नहीं, बल्कि दुष्टता का संपूर्ण नाश है —

हनुमान जी के वज्र समान प्रहार से।

जय हनुमान! मंत्रस्वरूप, रक्षक और संहारक!

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