बजरंग बाण (श्लोक 17)
बजरंग बाण श्लोक 17 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"सत्य होहु हरि सपथ पाय के।
राम दूत धरु मारु धाय के।।"
शब्दार्थ:
सत्य होहु = यह बात सत्य हो
हरि सपथ पाय के = भगवान श्रीहरि (राम) की शपथ लेकर
राम दूत = भगवान राम के दूत हनुमान
धरु मारु = पकड़ो और प्रहार करो
धाय के = दौड़कर
भावार्थ:
हे हनुमान जी!
भगवान श्रीराम की शपथ लेकर यह सत्य हो कि आप तुरंत दौड़कर आएं,
और शत्रु को पकड़कर उस पर प्रहार करें।
विस्तृत विवेचन:
1. राम की शपथ — विश्वास की पराकाष्ठा:
जब भक्त राम की शपथ दिलाकर हनुमान जी से प्रार्थना करता है,
तो यह दिखाता है कि उसकी भक्ति चरम पर है —
और उसे पूर्ण विश्वास है कि राम का दूत कभी झूठा नहीं होता।
2. हनुमान जी की तत्परता:
“धरु मारु धाय के” — यह पंक्ति हनुमान जी की गति और पराक्रम का चित्रण है।
वे शत्रु को पहचानते ही दौड़ते हैं और बिना विलंब उसे नष्ट कर देते हैं।
यहाँ शत्रु का अर्थ बाहरी संकट, भीतर का भय, रोग, या कोई दुष्ट विचार हो सकता है।
3. भक्त का आह्वान:
यह श्लोक भक्त की पुकार का चरम बिंदु है —
वह अब केवल प्रार्थना नहीं करता,
बल्कि विश्वास के साथ हनुमान जी को कर्तव्य स्मरण कराता है कि
“आप राम के दूत हैं — अब आकर शत्रु का अंत करें।”
निष्कर्ष:
यह श्लोक भक्त और भगवान के बीच अडिग विश्वास का प्रमाण है।
जब जीवन संकटों से घिरा हो, और कोई मार्ग न दिखे —
तब यह श्लोक एक आह्वान है हनुमान जी के लिए,
कि वे राम की शपथ पर दौड़कर आएं और
हर दैहिक, दैविक, भौतिक पीड़ा का अंत करें।
जय वीर हनुमान — सत्य के रक्षक, संकट के संहारक!
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