बजरंग बाण (श्लोक 18)
बजरंग बाण श्लोक 18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"जय जय जय हनुमंत अगाधा।
दुःख पावत जन केहि अपराधा।।"
शब्दार्थ:
जय जय जय = बारंबार वंदन, स्तुति
हनुमंत अगाधा = हे हनुमान! आप अथाह (अपार शक्ति वाले) हैं
दुःख पावत जन = भक्त दुख पा रहा है
केहि अपराधा = किस अपराध के कारण
भावार्थ:
हे परम तेजस्वी हनुमान जी!
आपकी जय हो, बार-बार जय हो।
आप अपार शक्ति और कृपा के स्रोत हैं।
भक्त यदि दुख पा रहा है, तो वह किस अपराध के कारण?
कृपया उसे क्षमा करें और उसका कष्ट हरें।
विस्तृत विवेचन:
1. हनुमान जी की करुणा को जगाने का प्रयास:
यह श्लोक भक्त की विनम्र पुकार है।
वह हनुमान जी की महिमा का गुणगान करते हुए कहता है—
“आप जैसे करुणासागर के होते हुए भी भक्त दुःख पा रहा है, तो जरूर कोई अनजाने में अपराध हुआ होगा।
कृपया उसे क्षमा करके, दुख से उबारिए।”
2. भक्ति में अपराधबोध और भरोसा दोनों:
यह श्लोक दो भावों को साथ लिए हुए है—
एक ओर भक्त का अपराधबोध ("केहि अपराधा")
दूसरी ओर हनुमान जी पर अटूट भरोसा, कि वह क्षमा करेंगे।
3. हनुमान जी की 'अगाधता':
"अगाध" शब्द यह दर्शाता है कि हनुमान जी की शक्ति, करुणा और कृपा सीमाहीन है।
जो भक्त सच्चे मन से पुकारता है, उनकी रक्षा निश्चित है।
निष्कर्ष:
यह श्लोक हनुमान जी की करुणा और न्याय के संतुलन को दर्शाता है।
भक्त जब दुःख में होता है, तो वह हनुमान जी की शरण में आकर कहता है—
"आप ही तो सब दुख हरते हैं, तो फिर मेरी पुकार क्यों अनसुनी हो रही है?
क्या मैंने कोई अपराध कर दिया है?
यदि हाँ, तो भी आप कृपालु हैं —
मुझे क्षमा करके अपनी शरण में लीजिए।"
हनुमान जी का यह स्वरूप—अगाध, कृपालु, दुखहरण—हर भक्त के लिए आश्रय का प्रतीक है।
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