बजरंग बाण (श्लोक 20)

 बजरंग बाण श्लोक 20 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

श्लोक:

"वन उपवन मग गिरि गृह माहीं।

तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।"

शब्दार्थ:

वन उपवन = जंगल और बग़ीचे

मग = मार्ग (रास्ता)

गिरि = पर्वत

गृह माहीं = घर में

तुम्हरे बल = तुम्हारी शक्ति से

हम डरपत नाहीं = हम नहीं डरते

भावार्थ:

हे हनुमान जी!

आपकी शक्ति के कारण हमें न तो जंगल में, न रास्ते में,

न पहाड़ों पर और न ही घर में किसी प्रकार का डर लगता है।

विस्तृत विवेचन:

1. हनुमान जी की सर्वत्र सुरक्षा:

यह श्लोक भक्त के उस विश्वास को दर्शाता है जहाँ वह कहता है कि

"आपकी कृपा और बल के कारण, मैं कहीं भी जाऊँ — चाहे वह

जंगल हो, रास्ता हो, पहाड़ हो या मेरा घर — मुझे कोई भय नहीं है।"

यह हनुमान जी को 'संकटमोचन' के रूप में पुकारने का सार है।

2. भय पर विजय का भाव:

यह श्लोक दर्शाता है कि भक्त भीतर और बाहर के हर भय से मुक्त हो गया है।

हनुमान जी का स्मरण और उनकी भक्ति

उसे एक ऐसी अभेद्य सुरक्षा-कवच प्रदान करती है,

जिसके होते हुए कोई दुष्ट, भय, या बाधा पास नहीं आ सकती।

3. भक्ति से उत्पन्न निर्भीकता:

हनुमान जी की भक्ति केवल संकट से रक्षा ही नहीं करती,

बल्कि भीतर आत्मबल और साहस भी देती है,

जिससे भक्त निडर होकर जीवन के हर मार्ग पर आगे बढ़ता है।

निष्कर्ष:

यह श्लोक एक सच्चे भक्त का घोषणा-पत्र है—

"अब मुझे किसी से कोई डर नहीं।

ना जंगलों के अंधेरे से,

ना रास्तों के खतरे से,

ना पहाड़ों की ऊँचाई से,

ना घर के भीतर के संकटों से।

क्योंकि मेरे साथ हैं — हनुमान जी।"

यह निर्भीकता, यह सुरक्षा —

केवल नाम लेने से मिलती है,

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।”

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