बजरंग बाण (श्लोक 5)
बजरंग बाण श्लोक 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"आगे जाई लंकिनी रोका।
मारेहु लात गई सुर लोका।।"
शब्दार्थ:
आगे जाई = आगे बढ़कर
लंकिनी रोका = लंका की रक्षिका "लंकिनी" ने रोका
मारेहु लात = लात मार दी
गई सुर लोका = स्वर्गलोक चली गई
भावार्थ:
जब हनुमान जी लंका पहुँचे, तो लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। हनुमान जी ने उसे केवल एक लात मारी और वह वहीं मरकर स्वर्ग चली गई।
विस्तृत विवेचन:
1. लंका की द्वारपालनी लंकिनी:
यह श्लोक रामकथा के उस प्रसंग से संबंधित है जब हनुमान जी लंका की ओर सीता माता की खोज में जाते हैं। लंका नगरी की द्वारपाल एक राक्षसी थी — लंकिनी, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान था कि "जब कोई वानर मुझे पराजित कर देगा, तभी रावण का अंत निकट होगा।"
हनुमान जी जब लंका पहुँचे, लंकिनी ने उन्हें रोका — लेकिन उन्होंने केवल एक लात मारकर उसे परास्त कर दिया।
2. हनुमान जी की शक्ति का प्रदर्शन:
इस श्लोक के माध्यम से भक्तों को यह याद दिलाया जाता है कि हनुमान जी सिर्फ सेवक नहीं, शक्तिशाली योद्धा भी हैं। उन्होंने बिना शस्त्र के, केवल एक लात से एक दुष्ट शक्ति को स्वर्ग भेज दिया।
3. दुष्टता का अंत:
लंकिनी राक्षसी का पतन उस अधर्म का प्रतीक है जो जब-जब सच्चे धर्म के समक्ष आता है, नष्ट हो जाता है। हनुमान जी की यह क्रिया यह दर्शाती है कि सच्ची भक्ति और सेवा के मार्ग में कोई भी बाधा नहीं टिकती।
4. भक्ति का आत्मविश्वास:
यह श्लोक हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं और हमारे साथ ईश्वर का आशीर्वाद है, तो कोई भी दैत्य रूपी बाधा हमें रोक नहीं सकती।
निष्कर्ष:
"आगे जाई लंकिनी रोका..." श्लोक हनुमान जी की अद्भुत शक्ति, साहस और धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यह प्रसंग भक्तों को यह विश्वास दिलाता है कि जब हनुमान जी साथ होते हैं, तो लंका जैसे राक्षसी साम्राज्य भी निर्बल हो जाते हैं।
जब लंकिनी नहीं रोक सकी, तो हमारी समस्याएं भी उन्हें देखकर भाग जाती हैं।
जय हनुमान! संकट मोचन!
Comments
Post a Comment