बजरंग बाण (श्लोक 6)

 बजरंग बाण श्लोक 6 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:-

श्लोक:

"जाई विभीषण को सुख दीन्हा।

सीता निरखि परम् पद लीन्हा।।"

शब्दार्थ:

जाई = जाकर

विभीषण को = रावण के भाई विभीषण को

सुख दीन्हा = सुख प्रदान किया

सीता निरखि = सीता माता के दर्शन किए

परम् पद लीन्हा = उच्चतम लक्ष्य / परम सिद्धि प्राप्त की

भावार्थ:

हनुमान जी जब लंका पहुँचे, तो उन्होंने विभीषण को आध्यात्मिक सुख प्रदान किया और सीता माता के दर्शन कर अपना जीवन सफल बना लिया।

विस्तृत विवेचन:

1. विभीषण को सुख देना:

हनुमान जी जब लंका में सीता माता की खोज में पहुँचे, तब उन्होंने विभीषण से भेंट की। विभीषण रावण का भाई था, परंतु धर्मप्रिय और श्रीराम के प्रति श्रद्धावान था।

हनुमान जी ने उसे राम नाम, राम की महिमा और उनके उद्देश्यों से परिचित कराया, जिससे विभीषण को आत्मिक शांति और सुख की अनुभूति हुई। यही "सुख दीन्हा" का तात्पर्य है।

2. सीता माता के दर्शन और परम् पद:

हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका में सीता माता के दर्शन किए, तो यह उनके जीवन का सबसे पवित्र और परम् उद्देश्य सिद्ध हो गया।

"परम् पद लीन्हा" का अर्थ यहाँ आध्यात्मिक चरम स्थिति से भी है — जैसे किसी भक्त को भगवान का साक्षात्कार हो जाए।

3. भक्ति और सेवा का पूर्ण फल:

इस श्लोक में हनुमान जी के भक्त रूप का चरम देखा जाता है।

उन्होंने एक ही यात्रा में—

एक धर्मात्मा विभीषण को आनंद दिया

सीता माता के दर्शन करके प्रभु राम का कार्य सिद्ध किया

और स्वयं को भी आध्यात्मिक रूप से उच्च स्थिति में पहुँचा दिया।

4. प्रेरणा के रूप में श्लोक:

यह श्लोक सिखाता है कि यदि हम सच्चे हृदय से सेवा, भक्ति और धर्म के पथ पर चलें, तो हम न केवल दूसरों को सुख दे सकते हैं, बल्कि स्वयं 

भी परम पद (मोक्ष / आत्मिक आनंद) को प्राप्त कर सकते हैं।

निष्कर्ष:

"जाई विभीषण को सुख दीन्हा..." श्लोक केवल हनुमान जी के कार्यों का वर्णन नहीं, बल्कि एक भक्ति मार्ग की संपूर्ण झलक है।

जहाँ वे धर्मप्रिय विभीषण को सुख देते हैं, वहीं अपने आराध्य श्रीराम के कार्य हेतु सीता माता के दर्शन कर अपने जीवन की सिद्धि को प्राप्त करते हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा सुख — सेवा, भक्ति और परोपकार में ही है।

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