बजरंग बाण (श्लोक 9)
बजरंग बाण श्लोक 9 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक:
"लाह समान लंक जरिए गई।
जय जय कपि सुरपुर मह भई।।"
शब्दार्थ:
लाह समान = लाख (लाह) की तरह — जो जलकर तुरंत पिघल जाए
लंक जरिए गई = लंका जलकर नष्ट हो गई
जय जय कपि = वानरराज (हनुमान) की जय-जयकार
सुरपुर मह भई = देवताओं के लोक में (स्वर्ग में) जयकार हुई
भावार्थ:
हनुमान जी की पूँछ से लगी अग्नि ने लंका को ऐसे जला दिया जैसे कोई लाख (लाह) पिघल जाए। उनके इस अद्भुत कार्य से देवलोक में जय-जयकार होने लगी — "जय हो हनुमान जी की!"
विस्तृत विवेचन:
1. लंका का विनाश – अधर्म का अंत:
इस श्लोक में लंका दहन की पराकाष्ठा को दर्शाया गया है। हनुमान जी की पूँछ में अग्नि लगाई गई थी, पर उसी अग्नि को उन्होंने अस्त्र बना लिया।
उन्होंने लंका को चारों ओर से जलाकर ऐसे नष्ट कर दिया जैसे लाह (लाख की मोम) पिघल जाए — यह दिखाता है कि पाप का अंत सहज और निश्चित होता है।
2. देवताओं की प्रसन्नता:
जब हनुमान जी ने रावण की नगरी को जलाकर सीता माता का पता लगा लिया, तो देवताओं में आनंद की लहर दौड़ गई।
क्योंकि यह घटना राम विजय की ओर बढ़ता एक महत्वपूर्ण कदम थी।
"जय जय कपि सुरपुर मह भई" — यह दर्शाता है कि हनुमान जी केवल धरती पर नहीं, स्वर्ग में भी पूज्य हैं।
3. हनुमान जी का तेज और पराक्रम:
यह श्लोक हनुमान जी की बुद्धि, वीरता और संकल्प का संगम है।
जिनसे पूरी लंका का साम्राज्य थर्रा उठा और देवता भी जय-जयकार करने लगे।
4. भक्तों के लिए प्रेरणा:
यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब कोई सच्चे उद्देश्य से, ईश्वर के कार्य में जुटता है, तो प्रकृति, देवता और स्वयं ईश्वर भी उसकी पीठ थपथपाते हैं।
यह धर्म और निडरता का प्रतीक है।
निष्कर्ष:
"लाह समान लंक जरिए गई..." श्लोक हनुमान जी के द्वारा अधर्म पर दी गई सबसे बड़ी चेतावनी का प्रतीक है।
उनकी अग्निपरीक्षा ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा भक्त जब जागता है, तो रावण जैसे साम्राज्य भी मोम की तरह पिघल जाते हैं।
देवता भी उस वीर को प्रणाम करते हैं, जो सच्चाई के लिए अकेले पूरी लंका से टकरा जाता है।
जय श्री हनुमान!
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